उत्तर प्रदेश का 2027 का विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा दंगल होने जा रहा है। 403 सीटों वाले इस राज्य में 2017 और 2022 में प्रचंड बहुमत से जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी के सामने इस बार दोहरी चुनौती है: दस साल की सत्ता की एंटी इनकंबेंसी और समाजवादी पार्टी का पुनरुत्थान।
भाजपा के अपने आंतरिक सर्वेक्षणों ने ही खतरे की घंटी बजा दी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पार्टी ने कम से कम 100 विधायकों की पहचान की है जो जमीनी स्तर पर एंटी इनकंबेंसी का सामना कर रहे हैं, और बड़ी संख्या में उनका टिकट कट सकता है। 255 सीटों पर किए गए आकलन में मतदाताओं के बीच इन विधायकों पर भरोसे की कमी सामने आई है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार करीब 40 प्रतिशत मौजूदा भाजपा विधायकों को टिकट से वंचित किया जा सकता है।
यह स्थिति 2022 के अनुभव से और गंभीर हो जाती है, जब टिकट बदले गए उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट (77%) पुराने चेहरों (85%) से कम रहा था। यानी नए चेहरे लाना भी गारंटी नहीं देता। बेरोजगारी, पेपर लीक, आरक्षण के मुद्दों पर नाराजगी और शिक्षक वर्ग की नाराजगी (हाल के एमएलसी चुनाव में सपा ने 11 में से 5 सीटें जीतीं) भाजपा के लिए खतरे के संकेत हैं।
नवंबर 2026 से चुनाव तक दल-बदल का दौर तेज होने के पूरे आसार हैं, और इसके शुरुआती संकेत दिखने भी लगे हैं। अक्टूबर 2026 में सपा के तीन बागी विधायक, राकेश प्रताप सिंह (गौरीगंज), अभय सिंह (गोसाईगंज) और विनोद चतुर्वेदी (कालपी), भाजपा में शामिल हो गए। ये तीनों 2024 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के बाद सपा से दूर हो गए थे।
वहीं दूसरी तरफ, भाजपा नेता धर्मेंद्र कश्यप राज्यसभा टिकट न मिलने के बाद सपा में शामिल हो गए, और गोरखपुर के भाजपा नेता डॉ. संजयन त्रिपाठी भी एमएलसी चुनाव के दौरान सपा में आ गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूर्व भाजपा सांसद राजपाल सैनी, विदुप अग्रहरि और बदायूं के भाजपा नेता रवि प्रताप सिंह समेत कई नेता लखनऊ में अखिलेश यादव की मौजूदगी में सपा में शामिल हुए, जिसे अखिलेश ने “बड़े बदलाव की शुरुआत” बताया।
यह द्विदिश दल-बदल बताता है कि टिकट की आस में दोनों पार्टियों के असंतुष्ट नेता पाला बदलेंगे। जिसका टिकट कटेगा, वह दूसरी तरफ जाएगा। 2022 में भी यही हुआ था, जब स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कई भाजपा मंत्री सपा में गए थे।
2029 में “एक देश, एक चुनाव” की संभावना का 2027 के चुनाव पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ सकता है। हालांकि तथ्य यह है कि 129वां संविधान संशोधन विधेयक अभी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास लंबित है, और इसके मौजूदा मसौदे के तहत नियत तिथि आम चुनाव के बाद ही तय होगी, यानी पहला पूर्ण समकालिक चक्र 2034 का लक्ष्य रखता है, 2029 का नहीं। पी. चिदंबरम ने भी कहा है कि 2029 में एक साथ चुनाव संभव नहीं हैं।
फिर भी, एनडीए 22 राज्यों की विधानसभाएं 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ कराने की संभावना तलाश रहा है। अगर मतदाताओं को लगता है कि 2027 में चुनी गई विधानसभा का कार्यकाल छोटा हो सकता है, तो वे “स्थिरता” के बजाय “बदलाव” के लिए वोट कर सकते हैं। यह धारणा सपा के पक्ष में काम कर सकती है।
सपा की संभावनाओं के पक्ष में कई तर्क हैं: 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठजोड़ मज़बूत हुआ है, और 26 नवंबर 2026 को अखिलेश “पीडीए का प्रणपत्र” जारी करने वाले हैं।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं। न्यूज़18-पीवैल्यू सर्वे (30,925 उत्तरदाताओं) में भाजपा-एनडीए को 66.6% वोट इरादा मिला, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन को 26.4%। हालांकि सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं, और इंडियन एक्सप्रेस के सर्वे में दोनों पार्टियों के प्रति मतदाताओं की थकान दिखी है, एंटी इनकंबेंसी “फैली हुई” है, सपा के पीछे संगठित नहीं।
2027 का चुनाव भाजपा के लिए 2017 या 2022 जैसा एकतरफा नहीं होगा। 100 से अधिक विधायकों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी, द्विदिश दल-बदल, और शिक्षक-बेरोजगार वर्ग की नाराजगी भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है। लेकिन सपा को सरकार बनाने के लिए एंटी इनकंबेंसी को वोटों में बदलना होगा, बूथ प्रबंधन मज़बूत करना होगा और कांग्रेस-बसपा के वोटों का बंटवारा रोकना होगा। “एक देश, एक चुनाव” की चर्चा माहौल तो बनाएगी, पर कानूनी रूप से 2029 में इसका लागू होना संदिग्ध है। अंतिम फैसला उत्तर प्रदेश का मतदाता करेगा, जो हमेशा से चौंकाने के लिए जाना जाता है।

