विश्व बैंक की ताजा Poverty & Equity Brief भारत के लिए उम्मीद भरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार 4.2 डॉलर प्रतिदिन की गरीबी रेखा पर भारत में गरीबी 2026 में 14.2% से घटकर 2028 तक 12.1% रहने का अनुमान है। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा 2011-2023 का है, जब इस पैमाने पर गरीबी 57.7% से घटकर मात्र 16.1% रह गई, यानी लगभग 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले।
अति-गरीबी (3 डॉलर प्रतिदिन) में तो और भी तेज गिरावट आई है, जो 27.1% से घटकर 2.6% पर आ गई है। यह लगभग उन्मूलन के करीब है। विश्व बैंक इसका श्रेय तीन बड़े कारकों को देता है: मजबूत उपभोग वृद्धि, रोजगार में बढ़ोतरी विशेषकर महिलाओं की भागीदारी, और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक हस्तांतरण योजनाओं का विस्तार।
हालांकि, यह कहानी सिर्फ सफलता की नहीं है। जैसे-जैसे गरीबी घटी है, वह अब कुछ खास समूहों में सिमट गई है। कम शिक्षित, कम संपत्ति वाले, अस्थिर रोजगार वाले और अधिक निर्भरता अनुपात वाले परिवार अब गरीबी के केंद्र में हैं। इसका अर्थ है कि अब आगे की लड़ाई सबसे कठिन होगी, क्योंकि यह वंचित वर्ग विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है।
सबसे बड़ी चिंता आय असमानता है। 2023 में शीर्ष 10% श्रमिकों की औसत आय निचले 10% से लगभग 13 गुना अधिक थी। यह बताता है कि विकास का लाभ सब तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।
निष्कर्षतः, भारत ने पैमाने और गति दोनों में अभूतपूर्व गरीबी उन्मूलन किया है, जो वैश्विक मिसाल है। लेकिन अब नीति का फोकस केवल संख्या घटाने से हटकर समावेशी विकास पर होना चाहिए। शिक्षा, स्थिर रोजगार और संपत्ति निर्माण पर निवेश ही बची हुई गरीबी को तोड़ेगा और 13 गुना आय खाई को पाटेगा।

